राखी कलाई पर सूत का धागा बांधना नहीं बल्कि अज्ञान से निकलकर शुद्ध चेतना और आत्म-मुक्ति मार्ग खोजना
चंडीगढ़, 27 अगस्त (जस्ट क्लिक) : आज रक्षाबंधन का त्यौहार है। हर त्यौहार कोई संदेश देने के लिए आता है। क्या तुम्हें पता है कि रक्षाबंधन क्या है? क्या यह सिर्फ राखी या धागा बांधना है या कुछ अंदर का बांधना है? क्योंकि ये धागे तो अभी खुल जाएंगे। प्रेम का यह बंधन इस बात का प्रतीक है कि तुम धागा बांधते-बांधते अपनी अंदर चेतना से बंध जाओ। यदि तुम चेतना से बंध गए, तो धागा नहीं भी बांधा तो क्या फर्क पड़ता है और अगर धागा बांधा परंतु अंदर से नहीं बंधे, तो ऐसे किस काम का धागा बांधना? मैं संसार में बंधा हुआ हूं और माया के जाल में फंस गया हूं तो क्या कोई ऐसा है जो मेरी रक्षा कर सके? कौन तुम्हारी रक्षा करेगा, कभी सोचा है? तुम्हारे अंत:करण से कौन रक्षा करेगा? कभी कहा जाता था कि यह भाई का रक्षाकवच है, इसलिए किसी भी हालात में भाई हमारी रक्षा करेगा। अब देख लो कितने भाई रक्षा करते हैं और कितनी बहनें आज उतावली होती हैं कि भैया को राखी बांधें। अब रक्षाबंधन का त्यौहार मिटता जा रहा है, क्योंकि हमारे अंदर से उमंग, भाव और श्रद्धा खत्म होती जा रही है। इसका कारण है, बाहर का विकास। फिर यह रक्षा किसकी कही गई थी? यह रक्षा कोई धागे की नहीं थी, यह रक्षा सिर्फ कोई बाहरी बात नहीं थी। यह तो अंत:करण की रक्षा की बात है। अंत:करण यानी अंदर तुम्हारी कोई रक्षा करने वाला आ जाए। बाहर की रक्षा करने वाला आखिर कब तक तुम्हारी रक्षा करेगा? कथा भी कहती है कि श्रीकृष्ण भगवान ने द्रौपदी की रक्षा की। क्यों की? क्योंकि द्रौपदी ने कभी उन्हें धागा बांधा था। जब युद्ध में कहीं कृष्ण जी की उंगली में कट लग गया और खून निकल आया तो द्रौपदी ने पल्लू फाड़कर उसे वहां बांध दिया था। तब श्रीकृष्ण ने कहा था ‘बहना, कभी भी, किसी भी हालात में तुम्हें मुझसे जो भी मांगना हो, मांंग लेना, मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा’ और उन्होंने रक्षा की। अब वह कोई संसार के भाई थोड़े ही थे जो रक्षा कर रहे थे, केवल परमात्मा ही ऐसा कर सकतें हैं। रक्षा मुख्य रूप से किसकी करनी है? परमात्मा मुझे मेरी कामवासनाओं, क्रोध और लोभ से रक्षा करवाओ! मेरे अंदर कामवासना का जो उबाल है, उससे मेरी रक्षा करो। सतगुरु तुम्हें बंधनों से मुक्ति की ओर ले जाने के लिए होते हैं, इसलिए वह तुम्हारे सारे बंधनों से तुम्हारी रक्षा करते हैं। कामवासना, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार - ये पांच विकार हैं जो तु्म्हारे को इस संसार से बांधकर बैठे हैं और यदि इन पांचों से तुम विरक्त हो गए, तो मुक्त हो गए। इसलिए रक्षाबंधन का अर्थ है कि जीवन में जो कोई भी बंधन हो, उसमें मैं अपनी चेतना की रक्षा कर सकूं। इस जीवन का रहस्य समझो कि तुम्हारी रक्षा केवल एक ही कर सकता है-परमात्मा। शरीर का बंधन तो संसार में हो ही जाता है, तुम्हें भाई, मां-बाप, पति-पत्नी मिल ही जाते हैं परंतु चेतना का संबंध इस संसार का नहीं है। इसलिए वो तुम्हारी प्यास देखकर ही ब्रह्मांड से उतरता है। अगर तुम सच्चे दिल से चाहोगे, तो फिर वह तुम्हारे जीवन में प्रकट होगा। तुम्हारी प्यास होगी, तुम्हारी भूख होगी तो तुम्हारा उससे मिलन भी होगा। इसलिए आज के इस रक्षाबंधन के दिन उस रक्षक को पुकारो, जो अगर हर पल तुम्हारे साथ हो गया, तो संसार से सारे दुख खत्म हो जाएंगे। संसार की कोई भी यातना तुम्हें प्रताड़ित नहीं कर पाएगी, कुछ भी नहीं! क्योंकि प्रेम में जब तुम पहुंच जाते हो, तो पूरा ब्रह्मांड तुम्हारी ओर देखता है, पूरा ब्रह्मांड तुम्हारा हो जाता है। इस रक्षाबंधन पर उस रक्षक को अपने जीवन में लाना है। बाहर से बंधनों को निभाओ पर उन्हें बाहर ही रखो; बंधनों को अंदर न ले जाओ, अंदर केवल उस एक से ही बंधन हो। जब अंदर संसार चला जाता है, तो वह एक हट जाता है। इसलिए जागो! हर उत्सव तुम्हें कोई संदेश देने के लिए है। यह बाहर का रक्षाबंधन प्रतीकात्मक है। यह धागा तो खुल जाएगा परंतु अंदर के धागे से, अंदर की चेतना से कब तुम्हारा मिलन होगा, ताकि वह परम-चेतन अवस्था आ जाए जो तुम्हारा सच्चा रक्षक है। इसलिए उस एक को पाना है, उससे बंधन बनाना है, तभी इस जीवन की रक्षा होगी, मुक्ति होगी और तुम्हारा जन्म सफल होगा।