आर्थराइटिस केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं, युवाओं और बच्चों को भी कर सकती है प्रभावित

आर्थराइटिस नहीं सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी

आर्थराइटिस केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं, युवाओं और बच्चों को भी कर सकती है प्रभावित

डॉ. पीयूष अग्रवाल के अनुसार आर्थराइटिस केवल बुजुर्गों में नहीं होता; यह युवाओं और बच्चों को भी प्रभावित कर सकता है। सही पहचान और उपचार से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

आर्थराइटिस केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं युवाओं और बच्चों को भी कर सकती है प्रभावित

जयपुर  (हि.स.) आर्थराइटिस को आमतौर पर बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारी माना जाता है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल जयपुर के ऑर्थोपेडिक्स एवं जॉइंट रिप्लेसमेंट विशेषज्ञ डॉ. पीयूष अग्रवाल के अनुसार आर्थराइटिस केवल बुजुर्गों तक सीमित बीमारी नहीं है बल्कि यह युवाओं और बच्चों को भी प्रभावित कर सकती है। समय पर लक्षणों की पहचान और उचित उपचार से इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
डॉ. अग्रवाल ने बताया कि आर्थराइटिस जोड़ों से जुड़ी बीमारियों का एक व्यापक समूह है। ऑस्टियोआर्थराइटिस उम्र बढ़ने के साथ जोड़ों में घिसाव के कारण होता है, जबकि रूमेटॉइड आर्थराइटिस एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जो युवावस्था या मध्य आयु में भी शुरू हो सकती है। वहीं जुवेनाइल आर्थराइटिस बच्चों में भी देखने को मिलता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मोटापा, निष्क्रिय जीवनशैली, गलत बैठने की आदत, लगातार दबाव, खेलों में चोट और पुराने आघात जैसी वजहों से युवाओं में भी जोड़ों की समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। इसके बावजूद लोग जोड़ों के दर्द और सूजन को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे बीमारी गंभीर रूप ले सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार लगातार दर्द, सूजन, जकड़न या जोड़ों की गतिविधि में कमी आर्थराइटिस के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। इन लक्षणों की अनदेखी करने से अंदरूनी क्षति बढ़ सकती है और बाद में उपचार कठिन हो जाता है। कुछ प्रकार के आर्थराइटिस शरीर के अन्य अंगों जैसे आंखों, त्वचा और आंतरिक अंगों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
डॉ. अग्रवाल ने बताया कि कई लोग यह मान लेते हैं कि आर्थराइटिस होने पर शारीरिक गतिविधियां बंद कर देनी चाहिए, जबकि हल्का व्यायाम, स्ट्रेचिंग और मांसपेशियों को मजबूत करने वाले अभ्यास इस बीमारी के प्रबंधन में काफी मददगार साबित होते हैं। लंबे समय तक निष्क्रिय रहने से जोड़ों की जकड़न और दर्द बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों, दवाओं, फिजियोथेरेपी, वजन नियंत्रण और जीवनशैली में बदलाव के जरिए आर्थराइटिस के लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है और मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।
डॉ. अग्रवाल ने लोगों से अपील की कि जोड़ों के दर्द को केवल उम्र का असर मानकर अनदेखा न करें। समय पर चिकित्सकीय सलाह और जागरूकता से इस बीमारी के गंभीर प्रभावों से बचा जा सकता है।

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